देश के लिए ये बहुत शर्म की बात है कि आजादी के 65 साल बाद भी अभी तक हम जातिगत भेदभाव के अत्याचार से मुक्त नहीं हुए हैं. अनगिनत लोगों को अभी भी अपमानजनक परिस्थितियों में रहना पड़ रहा है, बच्चे विद्यालय जाने में असमर्थ हैं, रोजगार के रास्ते बंद हैं और यहाँ तक कि शिक्षा भी इस कट्टरता को लोगों के दिलो-दिमाग से दूर नहीं कर पा रही है. विकास का कोई भी मापदंड तब तक सही नहीं हो सकता, जब तक लोगों की समानता के प्रश्न को इसके साथ नहीं जोड़ा जाय. जातीय भिन्नताओं को अस्वीकार कर देने पर ही हम एक प्रगतिशील राष्ट्र माने जा सकते हैं.
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