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नि:शक्तता

एपिसोड ६: भरेंगे उड़ान हम !


नि:शक्त व्यक्ति भी जीवन के प्रति वही उत्साह और अवधारणा रखते हैं जैसा हम सामान्य लोग रखते हैं. वो भी मुख्यधारा में शामिल होकर जीवन के सभी पहलुओं में शरीक होना चाहते हैं और हो भी सकते हैं. लेकिन उनको नकार दिया जाता है, उनकी क्षमता पर संदेह किया जाता है, उनका उपहास उड़ाया जाता है और अपमानित किया जाता है. सार्वजनिक स्थानों और भवनों तक उनकी पहुँच सीमित है और कई बार असम्भव है. शिक्षा और रोजगार के दरवाजे बंद हैं. भारत में अभी नि:शक्त लोगों की क्षमतायों की पहचान और सम्मान के लिए पर्याप्त परिपक्वता और समझ विकसित नहीं हुयी है.



मॊस्त रॆद्
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11 साल की श्रेया चतुर्वेदी के लिए उसकी माँ प्रतिभा जीवन की रोशनी है. अकेली माँ को इस बात का अफ़सोस है कि आजीविका के लिए काम करने के कारण वह श्रेया के विकास के लिए अधिक समय देने में असमर्थ है. कई मुख्यधारा के विद्यालयों द्वारा अस्वीकार कर दिए जाने के बाद वह अक्षय प्रतिष्ठान(http://akshaypratishthan.org/ )में आई, समावेशन तथा समावेशी शिक्षा के प्रयोग के रूप में 1998 में स्थापित अक्षय प्रतिष्ठान आज पुनर्वास केंद्र के रूप में 450 से अधिक बच्चों की मदद कर रहा है. शिक्षा के अलावा यह व्यवसायिक प्रशिक्षण, चिकित्सीय देखभाल तथा रोजगार के अवसरों के लिए जाना जाता है. श्रेया कहती है कि वह अपने विद्यालय को बहुत पसंद करती है. और ऐसा इस हंसमुख और प्रफुल्लित लड़की को देख कर दिखाई भी देता है. जबकि वह चलना चाहती है फिर भी प्रसन्नता और दिन प्रति दिन बढ़ती दृढ़ता के साथ वह खुद को स्वीकार करती है.

साईं प्रसाद विश्वनाथन ने निर्णय लिया कि वह दुनिया को दिखा देंगे कि एक नौजवान जिसको भारत में बस पकड़ने में भी मुश्किल होती है, वह बाहर जा सकता है और आसमान छू सकता है, वे कुछ ही लोगों में से एक हैं, जिनको अमेरिका में विस्कोंसिन विश्वविद्यालय द्वारा कंप्यूटर आर्किटेक्चर तथा चिप डिजायन में शोध के लिए फेलोशिप मिली हुयी है. साईं प्रसाद कहते हैं -" जब मैं बैठ कर अतीत को देखता हूँ , मैं एक अनुभव जरुर लिखना चाहूँगा. अपनी नि:शक्तता के बावजूद जब मैंने अपने आप पास के लोगों में यह घोषणा कि मैं अपने एम् एस प्रोग्राम के अध्ययन के लिए अमेरिका जाऊंगा तो वह आश्चर्य और धक्का जो लोगों ने महसूस किया और वह हतोत्साहन जो मैंने झेला, वह डर जो मुझे दिखाया गया और वह सहानुभूति जिसका मैने सामना किया.

कृष्णकांत माणे न केवल दृष्टिहीनों के लिए बल्कि सुविधाविहीन वर्ग के लिए मुक्त ज्ञान संसाधन, मुफ्त साफ्टवेयर अनुप्रयोगों के उपयोग की वकालत करते हैं. मुफ्त साफ्टवेयर की बात सिर्फ लागत के बारे में नहीं है, बल्कि उस आजादी के बारे में है जो सबको मिलनी चाहिए. किसी को स्वामित्व सॉफ्टवेयर के साथ उतनी आसानी और सुगमता नहीं होगी क्योंकि उसका स्रोत कोड सामान्य लोगों के पहुँच में नहीं होगा. और कमजोर लोग जो सामाजिक आर्थिक पदानुक्रम में नीचे आते हैं, उन सॉफ्टवेयर का प्रयोग करने में सक्षम नहीं हैं जबकि वे उपयोगी और प्रासंगिक हैं.

अमर ज्योति (www.amarjyotirehab.org )की संस्थापक डॉ० उमा तुली ने उन कठिनाइयों की हद को जिसका सामना एक नि:शक्त करता है, पहली बार तब महसूस किया जब 1965 में वह महाविद्यालय में पढ़ाती थीं और उनके 21 साल के भाई का एक दुर्घटना के बाद अंग विच्छेदन करना पड़ा. अंत में वह अमेरिका चला गया और उसको वहां नौकरी मिल गयी. इन्होने यह गौर किया कि अमेरिका में नि:शक्त व्यक्ति को एक व्यक्ति ही माना जाता है और यहाँ भारत में उसको सिर्फ दया और सहानुभूति की वस्तु माना जाता है . उसके बाद भारी प्रगति हो चुकी है पर अभी भी वैसा भारतीय समाज जहाँ नि:शक्तों को सामाजिक तानेबाने का अभिन्न अंग माना जाता हो, बनने में बहुत लम्बा रास्ता तय करना है.

सीमा तुली कई वर्षों तक विशेष शिक्षा की शिक्षिका रही हैं और आज अमर ज्योति विद्यालय की प्राचार्या हैं. ज्ञान की प्यास उन्हें नवीनतम शैक्षणिक तकनीकों और शिक्षा के क्षेत्र की अन्य प्रगतियों से अद्यतन रखती हैं. सांस्कृतिक, क्रीडा तथा व्यावसायिक गतिविधियाँ में उनकी रूचि उनके विद्यार्थियों के सम्पूर्ण व्यक्तित्व के विकास में सहायक सिद्ध होती हैं.

निशा लोबो ने अपने दत्तक माता पिता डेविड तथा डॉ एलोमा लोबो का दिल तभी जीत लिया था जब उन्होंने उसको देखा था. उन्होंने उसके साथ जो बंधन महसूस किया था जिसकी गूंज निशा के अपने नए भाई बहनों से मिलने पर सुनाई दी और वास्तव में वह उन सभी के दिल को छू लेती है जो उसे उस से निकलने वाली शुद्ध ख़ुशी के साथ देखते हैं. विशेष तौर पर कला और शिल्प में रूचि रखने वाली निशा कई भाषाएँ भी सिख रही है. नवीनतम भाषा स्पेनिश है. डॉ0 अलोमा लोबो और उनके व्यवसायी पति ने 23 साल पहले एक बच्चे को गोद लिया था तब से परित्यक बच्चों के पुनर्वास से जुड़ी हुयी हैं. वह पेंग्विन गाइड टू एडोप्शन इन इण्डिया की सह लेखक हैं और स्वैच्छिक समन्वय संस्था कर्नाटक की अध्यक्ष हैं. लोबो परिवार ने कई बच्चों को तब तक पोषित किया जब तक की उन्हें दत्तक घर नहीं मिल गए, और वो कहते हैं कि हर एक बच्चा जिससे वो मिले, उसने उन्हें दुनिया को देखने का नया तरीका सिखाया जैसा कि एक बच्चे की आँखों के माध्यम से दिखता है. निशा आगे बढ़ने में सफल हो रही है, उसकी हाल की एक उपलब्धि है अपने विद्यालय के फैशन शो में रैम्प पर चलना और उसे खूब गर्मजोशी से तालियाँ मिली.

केतन कोठारी एक अंतर्राष्ट्रीय विकास संस्था साईटसेवर्स (http://www.sightsaversindia.in)जो परिहार्य दृष्टिहीनता को समाप्त करने तथा नि:शक्त व्यक्तियों के लिए अवसरों की समानता को बढ़ावा देने के लिए सहयोगियों के साथ कार्य कर रही है, में क्षेत्रीय कार्यक्रम विकास सलाहकार हैं. केतन ने राजनीति शास्त्र में स्नातकोत्तर किया है तथा सामाजिक उद्यमिता में एमबीए की उपाधि प्राप्त की है, और उनके पेशेवर जिन्दगी का एक बड़ा हिस्सा हमेशा सलाहकार का रहा है.

जावेद अबिदी राष्ट्रीय नि:शक्त रोजगार संवर्धन केंद्र के निदेशक तथा निशक्त अधिकार समूह के संस्थापक हैं. उनका कार्य भारत में नि:शक्त व्यक्तियों के विधायी अधिकार तथा आर्थिक अवसरों को वास्तविकता में बदलना, विषयक, भौगोलिक तथा भाषागत बाधाओं को तोड़कर नि:शक्त समूहों का गठन कर राष्ट्रीय जनमत का निर्माण करना है.

डॉ० राजेंद्र जौहर अपने जीवन को दो भागों में देखते हैं. मध्यांतर के पहले और बाद. जब वो शय्याग्रस्त हो गये. वह कहते हैं कि उनका जीवन अब ज्यादा रोचक है क्योंकि वह ज्यादा करने में सक्षम हैं. उन्होंने फैमिली ऑफ़ डिसेबल्ड (http://familyofdisabled.org) की स्थापना की, जो निम्न आर्थिक सामाजिक स्तर के लोगों को उनकी आजीविका कमाने में मदद करती है, बच्चों के बीच गुणवत्ता युक्त शिक्षा को बढ़ावा देती है, नि:शक्त कलाकारों तथा कारीगरों को उनकी प्रतिभा दिखाने का अवसर देती हैऔर नि:शक्तता से जुड़े मुदद्दों पर जागरूकता फैलाती है.

जब कैप्टन (सेवानिवृत) कमलजीत सिंह बरार एक ई- लर्निंग समाधानों के उत्पादन के लिए एक कंपनी की स्थापना करना चाहते थे. उन्होंने कंपनी को नि:शक्त अनुकूलित बनाया. इस हद तक कि वास्तव में डिजायनमेट के अधिकांश कर्मचारी (लगभग २७०) नि:शक्त हैं. कैप्टन बरार आनंदित होते हुए कहते हैं कि समावेशन के कारण कर्मचारियों से ज्यादा फायदा उनकी कंपनी (www.designmate.com) को हुआ है.

जोगिन्दर सलूजा जो करना चाहते थे पोलियो उनको रोक नहीं पाई. एक जिम में अपनी नि:शक्तता के कारण जाने से रोक दिए जाने के कारण उन्होंने अपना जिम “वर्कआउट वंडर्स” प्रारंभ कर दिया . जोगिन्दर राष्ट्रीय स्तर के भारोत्तोलक हैं और उन्होंने शरीर-सौष्ठव तथा भारोत्तोलन में मि० इण्डिया ख़िताब जीता है. कला से स्नातक जोगिन्दर विस्वविद्यालय अनुदान आयोग को सलाह देते हैं कि किस प्रकार दिल्ली विश्वविद्यालय को और नि:शक्त अनुकूलित बनाया जाय.

सलाउद्दीन पाशा का परिवार नि:शक्तों के लिए दवाइयां लिखा करता था. पर जैसा कि वह कहते हैं कि उनका कॉल गलत लग गया - नृत्य और संगीत के माध्यम से उपचार का. एबिलिटी अनलिमिटेड(www.abilityunlimited.com)के संस्थापक अफ़सोस के साथ बताते हैं कि भारत में विशेषकर के शास्त्रीय संगीत से नि:शक्तों को बाहर रखा गया है. और वो यह सिद्ध करना चाहते हैं कि नि:शक्त व्यक्ति भी नृत्य कर सकते हैं. एबिलिटी अनलिमिटेड की प्रस्तुतियों में लोग ऐसा प्रदर्शन करते हैं जैसा सामान्य लोग करते हैं, बल्कि और अच्छे से करते हैं. कभी रंगमंच की सामग्रियों के रूप में तो कभी नर्तकों द्वारा वैशाखी और व्हीलचेयर भी प्रदर्शन करते हैं. इस तरह से सलाउद्दीन की आशा है कि समाज की धारणा बदलेगी.
मोहम्मद कैफ, निर्मला और करियप्पा उन अनगिनत बच्चों में से तीन हैं जो इस कारण विद्यालय से बाहर हैं क्योंकि वे निशक्तता और गरीबी की दोहरी मार झेल रहे हैं. ये उन अदृश्य बच्चों में से कुछ हैं जिन्हें एक मदद करने वाले हाथ की आवश्यकता है और यह हाथ उन स्वयंसेवी संगठनों का हो सकता है जो समावेशी शिक्षा तथा नि:शक्त जनों के अधिकारों के लिए कार्य कर रहे हैं. उनमें से एक है नेवर-द-लेस (http://nevertheless.in) जो फोर्थ वेव फाउंडेशन द्वारा प्रारंभ किया गया है तथा स्कूली शिक्षा से वंचित नि:शक्त बच्चों को शिक्षा देने के लिए कार्य कर रहा है तथा सत्यमेव जयते में दिखाए गए कुछ बच्चों को उनका शिक्षा का अधिकार दिलाने की कोशिश कर रहा है .
 
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